शहर ले गांव आबे त
गांव काटे ल दौड़थे
कहा जावव कहा लुकावव कइके
मन भागे ला दौड़थे,
सब्बो डहर सुनना जनाथे
संगी संगवारी के पता नई रहय
दिन भर मुस्कील म पहाथे
अऊ रतिहा बैरी नींद नई आय।
खेत खार जवई मन ढेरहा हे
खेत के रददा घलो अनटेरहा हे
बन के मुड़ी पूछी ल जानन नही
इही जान के कुछु ला उखानन नही
शहर के इडली डोसा अऊ समोसा सही
गांव के ढेठरी खुरमी हा सुहाय नही
ऊहा टेम्पो वाले सड़क म चले के आदत
गांव के चिखला गोबर म रेंगे जाय नही ।
मोबाइल के टॉवर अऊ सहरिया के पावर
गांव के गोबर गोमूत्र म सना गेहे
ईहा लुहनगी के चलन हवय
ऊहा के जींस जूता ह झोला म धरा गेहें।





